जयपुर। गुलाबी नगरी के समस्त गुरुद्वारों में ‘धन-धन श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ का पहला प्रकाश पर्व अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर गुरुद्वारा श्री गुरु नानक दरबार, वैशाली नगर में तीन दिवसीय विशेष धार्मिक समागम आयोजित किए गए। गुरुद्वारा प्रबंध समिति के प्रधान सरदार सर्वजीत सिंह माखीजा ने बताया कि प्रकाश पर्व को समर्पित तीन दिवसीय विशेष कीर्तन दीवानों की शुरुआत शुक्रवार शाम को हुई, जिसमें बड़ी संख्या में संगत ने शिरकत की।
इस दिनदिवसीय विशेष कीर्तन में शुक्रवार को विशेष कीर्तन दीवान शाम 7 से 10 बजे तक सजाया गया। शनिवार को प्रातःकालीन दीवान में श्री दरबार साहिब के हजूरी रागी भाई गुरबचन सिंह द्वारा ‘आसा दी वार’ का मनमोहक गायन किया गया। इसके उपरांत श्री सहज पाठ साहिब जी के भोग डाले गए। शनिवार शाम को भी भव्य कीर्तन दीवान सजाया गया।
13 सितंबर रविवार को भाई गुरबचन सिंह जी ने “संता कै कारज आप खलोइया, हर कम्म करावण आइया राम” शब्द का गायन कर संगत को निहाल किया। उन्होंने गुरुबाणी की व्याख्या करते हुए बताया कि परमात्मा सदैव अपने संतों के कार्यों को पूर्ण करने स्वयं आते हैं।
समागम के दौरान गुरुद्वारा वैशाली नगर के हजूरी रागी भाई जसविंदर सिंह ने प्रकाश पर्व के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सिखों के पांचवें गुरु, श्री गुरु अर्जुन देव जी ने इस पवित्र ग्रंथ का संकलन कराया था। 1 सितंबर 1604 ईस्वी को सचखंड श्री हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर), अमृतसर में इसका पहला प्रकाश किया गया था, जहाँ बाबा बुड्ढा जी को प्रथम ग्रंथी मनोनीत किया गया था।
सभी धार्मिक दीवानों की समाप्ति के पश्चात गुरुद्वारा साहिब में गुरु का लंगर अटूट बरताया गया, जिसमें हज़ारों श्रद्धालुओं ने पंगत में बैठकर प्रसाद ग्रहण किया।



















