जयपुर। टीकाकरण को आमतौर पर बचपन में लगाए जाने वाले नियमित टीकों तक सीमित माना जाता है, जबकि बदलती उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के साथ इसकी जरूरत बनी रहती है। किशोरावस्था से लेकर वयस्क जीवन, गर्भावस्था और वृद्धावस्था तक उम्र के अनुसार टीकाकरण निवारक स्वास्थ्य देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल जयपुर के कंसल्टेंट-इंटरनल मेडिसिन डॉ. अखिल गुप्ता ने कहा कि लोगों में अभी भी यह धारणा है कि बचपन में सभी जरूरी टीके लग जाने के बाद टीकाकरण की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। उन्होंने कहा कि उम्र के साथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और संक्रमणों का जोखिम बदलता रहता है। ऐसे में समय-समय पर टीकाकरण की जरूरत की समीक्षा करना जरूरी है।
डॉ. गुप्ता के अनुसार उम्र बढ़ने के साथ कुछ संक्रमणों का जोखिम और उनके गंभीर होने की आशंका बढ़ सकती है। खासकर डायबिटीज या हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियों से जूझ रहे लोगों में संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है। इसलिए ऐसे लोगों को चिकित्सकीय सलाह के अनुसार अपने टीकाकरण की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि टीकाकरण इतिहास की डॉक्टर के साथ समय-समय पर समीक्षा भी नियमित स्वास्थ्य जांच का हिस्सा होनी चाहिए। व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और जोखिम के आधार पर चिकित्सक आवश्यक टीकों को लेकर उचित सलाह दे सकते हैं।
उन्होंने जोर दिया कि टीकाकरण केवल बचपन की स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा नहीं है, बल्कि जीवन के अलग-अलग चरणों में संक्रमण से बचाव के लिए निरंतर निवारक स्वास्थ्य उपाय है। जागरूकता और समय पर टीकाकरण से व्यक्ति और समुदाय दोनों के स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।



















