जयपुर। हर वर्ष अप्रैल के अंतिम शनिवार को मनाए जाने वाले ‘वर्ल्ड वेटरनरी डे’ के अवसर पर ऐसे पशु चिकित्सकों को याद किया जाता है, जिन्होंने बेजुबान जीवों के संरक्षण और उपचार में असाधारण योगदान दिया है। इस कड़ी में जयपुर के नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में उपनिदेशक के पद पर कार्यरत डॉ. अरविंद माथुर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
डॉ. माथुर ने अब तक राजस्थान के 14 से अधिक जिलों में 82 पैंथर व टाइगर सहित 500 से ज्यादा वन्यजीवों का सफल रेस्क्यू किया है। इनमें हाथी, भालू, लकड़बग्घा, मगरमच्छ, घड़ियाल, हिप्पो, वुल्फ और हाइना जैसे कई खतरनाक और दुर्लभ वन्यजीव शामिल हैं। उनकी विशेषज्ञता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 50 से अधिक जटिल सर्जरी भी सफलतापूर्वक की हैं।
डॉ. माथुर केवल रेस्क्यू विशेषज्ञ ही नहीं, बल्कि अनाथ शावकों के ‘पालक पिता’ भी बन चुके हैं। कई बार जब टाइगर, पैंथर या लायन अपनी संतानों को स्वीकार नहीं करते, तब उन्होंने स्वयं बोतल से दूध पिलाकर उन्हें पाला-पोसा। व्हाइट टाइगर ‘स्कंदी’ और ‘भीम’ तथा गोल्डन लायन ‘शेरा’ इसके प्रमुख उदाहरण हैं, जिन्हें उन्होंने जीवनदान देकर स्वस्थ बनाया।
नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में अब तक 9 टाइगर शावकों के सफल पालन-पोषण में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिससे जयपुर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। इसके साथ ही उन्होंने वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए रेडियो कॉलरिंग, शिफ्टिंग और आधुनिक तकनीकों का भी प्रभावी उपयोग किया है।
डॉ. माथुर ने जयपुर में ‘हाथी गांव’ (एलीफेंट कंजर्वेशन और ब्रीडिंग मॉडल) को विकसित करने में भी अहम भूमिका निभाई है और पिछले 20 वर्षों से हाथियों के स्वास्थ्य व संरक्षण की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए उन्हें वर्ष 2013 में राज्य सरकार पुरस्कार, 2019 में जिला स्तर का सम्मान सहित कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। साथ ही उन्हें यूके और साउथ अफ्रीका में प्रशिक्षण के लिए भी भेजा गया, जहां से वे आधुनिक तकनीकों का अनुभव लेकर लौटे।
डॉ. अरविंद माथुर का कहना है कि बचपन से ही उन्हें वन्यजीवों से गहरा लगाव रहा, जिसने उन्हें इस क्षेत्र में आगे बढ़ाया। वे कहते हैं, “जिस काम को दिल से किया जाए, उसमें सफलता निश्चित है।”
वर्ल्ड वेटरनरी डे पर डॉ. अरविंद माथुर जैसे समर्पित विशेषज्ञों का योगदान यह साबित करता है कि सेवा और संवेदनशीलता केवल इंसानों तक सीमित नहीं, बल्कि बेजुबान जीवों के प्रति भी उतनी ही आवश्यक है।



















