सुंदरकांड केवल पाठ नहीं, जीवन प्रबंधन का विज्ञान है:आचार्य ईश्वरानंदा

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The Sundarkand is not merely a recitation, but a science of life management: Acharya Ishwarananda.
The Sundarkand is not merely a recitation, but a science of life management: Acharya Ishwarananda.

जयपुर। वेद विद्या ट्रस्ट दिल्ली के तत्वावधान में बनीपार्क स्थित श्री जंगलेश्वर महादेव मंदिर में एक दिवसीय ‘सुंदरकांड : एक तार्किक विश्लेषण’ ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं, विद्वानों और शहर के गणमान्य लोगों ने भाग लिया।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता आर्ष विद्या मंदिर, दिल्ली की वेदांत परंपरा के संवाहक आचार्य ईश्वरानंदा ने सुंदरकांड के माध्यम से जीवन प्रबंधन, आध्यात्मिकता और वेदांत के गूढ़ सिद्धांतों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सुंदरकांड केवल पारंपरिक पाठ नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला ज्ञान का भंडार है।

आचार्य ईश्वरानंदा ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भगवद्गीता में प्रतिपादित निष्काम कर्म के सिद्धांत और सुंदरकांड के संदेश आज भी समान रूप से प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में मनुष्य के पास भौतिक संसाधन, उच्च पद और धन-संपत्ति तो है, लेकिन इसके बावजूद जीवन में खालीपन और असंतोष बना रहता है।

उन्होंने सुंदरकांड के प्रसंगों का तार्किक विश्लेषण करते हुए बताया कि हनुमानजी के अनुसार वास्तविक विपत्ति धन, पद या स्वास्थ्य की हानि नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप और ईश्वर के स्मरण से दूर हो जाना है। भक्ति अंतःकरण को शुद्ध और कोमल बनाती है, जबकि वेदांत का ज्ञान मनुष्य को मोक्ष की ओर अग्रसर करता है।

आचार्य ने लंका दहन के प्रसंग को ज्ञान की अग्नि का प्रतीक बताते हुए कहा कि यह अग्नि मनुष्य के भीतर मौजूद अज्ञान, अहंकार और नकारात्मक प्रवृत्तियों को नष्ट करती है। उन्होंने कहा कि रामायण केवल एक ऐतिहासिक कथा नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रहे मानसिक और मनोवैज्ञानिक संघर्षों का जीवंत चित्रण है।

उन्होंने व्याख्या करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम प्रत्येक जीव के भीतर विद्यमान साक्षी चेतना और परमात्मा स्वरूप हैं, जबकि माता सीता आत्मा का प्रतीक हैं, जो मोह-माया और अज्ञान के कारण अपने वास्तविक स्वरूप से दूर हो जाती है। हनुमानजी अनुशासित मन, प्राणशक्ति और विवेकपूर्ण बुद्धि के प्रतीक हैं, जबकि रावण मनुष्य के भीतर मौजूद अहंकार, क्रोध और वासनाओं का प्रतिनिधित्व करता है, जो मानसिक शांति का हरण करते हैं।

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