डॉ. पवन सिन्हा ‘गुरुजी’ ने बताए भक्ति, ध्यान और सकारात्मक ऊर्जा के सूत्र

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Dr. Pawan Sinha ‘Guruji’ shares the secrets of positive energy.
Dr. Pawan Sinha ‘Guruji’ shares the secrets of positive energy.

जयपुर। विश्वप्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु व मोटिवेशनल स्पीकर डॉ. पवन सिन्हा ‘गुरुजी’ ने भगवान श्री राम व श्रीकृष्ण के जीवन के उदाहरणों के माध्यम से भक्ति, ध्यान व सकारात्मक ऊर्जा के सूत्र बताए। अवसर था महाराणा प्रताप ऑडिटोरियम में रविवार को आयोजित विराट सत्संग का। आध्यात्मिकता के दिव्य स्पंदनों से ओतप्रोत इस विराट सत्संग में देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर भक्ति, ध्यान और सकारात्मक जीवन-दृष्टि के विविध आयामों को आत्मसात किया तथा आत्मिक शांति, नवीन ऊर्जा और जीवन-दर्शन का अनुभव किया।

अपने प्रेरक उद्बोधन में डॉ. पवन सिन्हा ‘गुरुजी’ ने कहा कि यह अत्यंत खेद और पीड़ा का विषय है कि श्रीराम और श्रीकृष्ण के देश में लोग न तो श्रीराम के बारे में सही से जानते हैं और न ही श्रीकृष्ण के बारे में। सोशल मीडिया पर ऐसे-ऐसे कुत्सित विचार वाले वीडियो हैं जो श्रीराम और श्रीकृष्ण का मज़ाक बनाते हैं जो कि घोर निंदनीय है।

उन्होंने वाल्मिकी रामायण से अनेक उद्धरणों को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करते हुए रामराज्य की संकल्पना पर प्रकाश डाला। श्रीराम एवं श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़े प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया कि सच्ची भक्ति केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं होती, बल्कि सत्य, करुणा, धैर्य, अनुशासन और समर्पण को जीवन के प्रत्येक कर्म में उतारने का नाम भक्ति है।

गुरुजी ने अवसाद, तनाव और असफलता जैसी जीवन की चुनौतियों से मुक्ति के व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक उपाय बताए। विराट सत्संग में उन्होंने श्रद्धालुओं के व्यक्तिगत व आध्यात्मिक प्रश्नों के जवाब देकर उनका समाधान भी किया। आश्रम की सुर साधक मंडली में ख्याति, आस्तिक व करण ने ‘गुरुजी’ द्वारा रचित व संगीतबद्ध भजनों की प्रस्तुति से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। संपूर्ण आयोजन के दौरान महाराणा प्रताप ऑडिटोरियम श्रद्धा, भक्ति और सकारात्मक आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित रहा।

इस अवसर पर विधायक कालीचरण सराफ, पुरुषोत्तम तुलसियान, शशि तुलसियान, अध्यक्ष, अतिक्रमण निरोधक समिति अध्यक्ष मनोज मुद्गल, आरएएस पंकज ओझा, मुन्ना दास महाराज, डॉ. संजय बियानी, भाजपा नेता मुकेश पारीक, शिक्षाविद ऋतु रावत, उद्योगपति योगेश नरूला, रंगमंच कलाकार रुचि नरूला, फ़िल्म अभिनेत्री शशि शर्मा, डीन पूर्णिमा यूनिवर्सिटी राकेश गुप्ता, डॉ. गौरव, डॉ. कनक शर्मा, विक्रम मालवीय सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

भीड़ नहीं, देश के कर्णधार हैं युवा-

डॉ. पवन सिन्हा ने देश की युवा शक्ति की ऊर्जा, बुद्धि चातुर्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि देश का युवा भीड़ नहीं है, वह देश का कर्णधार है। भारतीय युवा शक्ति बेहद जिज्ञासु, संवेदनशील और जानकार है। इन युवाओं को आश्रम परंपरा से जोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज युवाओं का उपयोग नहीं प्रयोग हो रहा है जिसे बदलने की आवश्यकता है। बच्चों की परवरिश, संस्कार निर्माण पर विशेष ध्यान देना होगा।

अवसाद, निराशा और चिंताओं से मुक्ति का एकमात्र मार्ग आध्यात्मिक शिक्षा है जो सर्वाधिक सकारात्मक परिणाम देती है। श्री राम और श्री कृष्ण भी अपने अवसाद या डिप्रेशन से कैसे बाहर आए यह हमें जानना होगा। देश की युवा शक्ति 68 प्रतिशत से भी अधिक है। देश की इस युवा शक्ति को स्वयं की शक्तियों, अपनी ऊर्जाओं को पहचानना होगा और सही मार्ग पर चलना होगा। यह मार्ग अध्यात्म, ध्यान और भक्ति का मार्ग है।

ध्यान के बिना अधूरी है पूजा-

‘गुरुजी’ ने ध्यान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रभु की प्राप्ति, जीवन में सफलताओं की प्राप्ति के लिए ध्यान बहुत आवश्यक है। ध्यान के बिना भक्ति, पूजा अधूरी है। यदि हम पाँच मिनट तक भी अपने प्रभु, इष्ट की छवि को नहीं देख सकते तो इसका अर्थ है कि हमारी भक्ति में कमियाँ हैं। हमें अपनी भक्ति बढ़ानी होगी। भक्ति बढ़ाने के लिए गुरुजी ने ध्यानाभ्यास बढ़ाने का सूत्र दिया। नियमित ध्यानाभ्यास मन को स्थिरता प्रदान करता है, आत्मविश्वास का विकास करता है तथा सकारात्मक ऊर्जा का सतत संचार करता है। सभागार में उपस्थित भक्तों ने गुरूजी के सान्निध्य में सही तकनीक के साथ ध्यान का अभ्यास भी किया।

युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं ‘गुरूजी’-

डॉ. पवन सिन्हा ‘गुरुजी’ दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हैं। वे विगत 45 वर्ष से अधिक समय से आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार कर रहे हैं। वे पावन चिंतन धारा आश्रम के संस्थापक, भारत की सनातन संस्कृति के पुरोधा एवं अग्रणी संवाहक, क्रियात्मक आध्यात्मिकता के प्रणेता तथा वेदान्त दर्शन के व्यावहारिक स्वरूप के प्रतिष्ठित व्याख्याता हैं। डॉ. पवन सिन्हा भारतीय संस्कृति की वैज्ञानिकता, पारिवारिक मूल्यों, बाल-पालन, युवाओं में नेतृत्व क्षमता के विकास तथा शिक्षा के वास्तविक स्वरूप को देश-विदेश में जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

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