पुरुषोत्तम योग गीता का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय : स्वामी अभेदानंद

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Purushottama Yoga: The Most Important Chapter of the Gita – Swami Abhedananda
Purushottama Yoga: The Most Important Chapter of the Gita – Swami Abhedananda

जयपुर। मालवीय नगर स्थित महर्षि नारद सभागार में चिन्मय मिशन की ओर से भगवद्गीता के 15वें अध्याय पर प्रवचन करते हुए स्वामी अभेदानंद ने कहा कि पुरुषोत्तम योग गीता का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसे स्वयं शास्त्र कहा है। उन्होंने कहा कि पूरी गीता में जीव, जगत और ईश्वर के संबंध में जो समझाया गया है, उसका सार इस अध्याय के 20 श्लोकों में मिलता है। पूरी गीता न पढ़ पाने वाला व्यक्ति भी इस अध्याय को पढ़कर उसका सार समझ सकता है।

स्वामी ने संसार और वृक्ष की समानताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि संसार पीपल के विशाल वृक्ष की तरह है और मनुष्य अनेक जन्मों की वासनाओं व कामनाओं के साथ आता है। संसार और वृक्ष के आदि-अंत का पता नहीं लगाया जा सकता। संसार अनिर्वचनीय है तथा जिस प्रकार वृक्ष जड़ से धारण होता है, उसी प्रकार जीवन का मूल प्रभु हैं।

संसार की अनेक शाखाओं की तरह मनुष्य के अनेक जीवन, पत्तों की तरह कर्म और फलों की तरह विभिन्न परिस्थितियां प्राप्त होती हैं। शरीर भी वृक्ष पर आश्रित पक्षी की तरह जीव का आश्रय है और संसार की तरह निरंतर परिवर्तनशील है।

प्रात:कालीन सत्र में शुकदेव जी द्वारा रचित ‘शुकाष्टकम’ पर प्रवचन करते हुए स्वामी अभेदानंद ने कहा कि स्वयं से असंतोष सबसे बड़ी समस्या है। अहम के कारण मनुष्य सुख की तलाश में बाहर भागता है, जबकि वास्तविक स्वरूप में शांति है। रजस, तमस और सत्व गुणों के कारण मनुष्य कर्ता-भोक्ता बना रहता है, जबकि इनके पीछे दृष्टा मौजूद रहता है। साधक को कर्ता-भोक्ता भाव से वैराग्य प्राप्त होता है।

उन्होंने कहा कि ज्ञानी को बिम्ब और प्रतिबिम्ब दोनों अहम का अनुभव होता है, जबकि अज्ञानी केवल प्रतिबिम्बित अहम को जानता है। वृत्ति के अनुसार बदलने वाला अहम प्रतिबिम्बित अहम है, जबकि बिम्ब अर्थात वास्तविक अहम स्थिर रहता है। प्रतिबिम्बित अहम को ही जीव कहा गया है और तीनों गुणों से अलग अवस्था को निस्त्रैगुण्य कहा जाता है। उन्होंने कहा कि रजोगुण संसार की वस्तुओं में सुख दिखाता है और तमोगुण आलस्य में सुख का अनुभव कराता है।

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