आत्मसमीक्षा से रचना अधिक परिष्कृत और प्रभावशाली बनती है: नंद भारद्वाज

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Self-reflection makes a creative work more refined and impactful: Nand Bhardwaj
Self-reflection makes a creative work more refined and impactful: Nand Bhardwaj

जयपुर। कलमकार मंच और पिंकसिटी प्रेस क्लब के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पुस्तक लोकार्पण समारोह में अनिल सक्सेना ‘ललकार’ (चित्तौड़गढ़) के आलेख संग्रह ‘21वीं सदी का राजस्थान साहित्यिक आंदोलन’, साधना जोशी ‘प्रधान’ (सुजानगढ़) के गीत-गीतिका संग्रह ‘ठूँठ पर खिले पलाश’ और इन्दु सिन्हा ‘इन्दु’ (रतलाम) के कहानी संग्रह ‘उन दिनों प्रेम’ का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार नंद भारद्वाज, दुर्गा प्रसाद अग्रवाल, फारूक अफरीदी, विनोद भारद्वाज, राजाराम भादू, लोकेंद्र कुमार सिंह ‘साहिल’, चरणसिंह पथिक, गजेन्द्र एस. श्रोत्रिय, प्रेमचंद गांधी, कलमकार मंच के राष्ट्रीय संयोजक निशांत मिश्रा, प्रेस क्लब अध्यक्ष मुकेश मीणा और महासचिव राजकुमार शर्मा ने किया।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार नंद भारद्वाज ने कहा कि किसी भी लेखक के लिए आत्मसमीक्षा अत्यंत आवश्यक है। लेखक को अपनी रचना का पहला और सबसे कठोर पाठक होना चाहिए। आत्मसमीक्षा के माध्यम से रचना अधिक परिष्कृत, संतुलित और प्रभावशाली बनती है तथा अनावश्यक सामग्री को हटाने का अवसर मिलता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने कहा कि साहित्य की सभी विधाओं का अध्ययन लेखक के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि परंपरा कोई बंधन नहीं, बल्कि वह आधारभूमि है जिस पर खड़े होकर नई सृजनात्मक संभावनाओं का विकास किया जाता है। उन्होंने समय की बदलती संवेदनाओं को समझकर लिखने तथा एआई की चुनौतियों के बीच साहित्य की मौलिकता को बचाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया।

वरिष्ठ लेखक-पत्रकार विनोद भारद्वाज ने कहा कि साहित्य की प्रत्येक विधा समय के साथ बदलती रहती है। छंद और मुक्तछंद दोनों ने समयानुसार अपने स्वरूप और अभिव्यक्ति का विस्तार किया है तथा साहित्य को समृद्ध बनाया है।

वरिष्ठ आलोचक एवं विचारक राजाराम भादू ने कहा कि कलमकार मंच ने हिंदी साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। उन्होंने मंच के राष्ट्रीय संयोजक निशांत मिश्रा को अपने आप में एक संस्था बताते हुए कहा कि मंच ने लेखक और प्रकाशक के बीच संवाद को मजबूत किया है। उन्होंने कहा कि साहित्य का दायित्व समाज के यथार्थ को सामने लाना है तथा कविता का मूल्य उसके कथ्य, संवेदना और संदेश में निहित होता है।

वरिष्ठ शायर लोकेंद्र कुमार सिंह ‘साहिल’ ने कहा कि कविता और कहानी मूलतः सुनने और सुनाने की विधाएँ हैं। उन्होंने कवियों को व्यापक पठन-पाठन की सलाह देते हुए कहा कि कविता में भाव और विचार का संतुलित समन्वय होना चाहिए। उन्होंने छंद की महत्ता पर बल देते हुए एआई के माध्यम से लिखी जा रही कविताओं को भी साहित्य के सामने उभरती चुनौती बताया।

कार्यक्रम के प्रारंभिक सत्र में अनिल सक्सेना ‘ललकार’, साधना जोशी ‘प्रधान’ और इंदु सिन्हा ‘इंदु’ ने अपनी-अपनी पुस्तकों और लेखन-दृष्टि पर विचार व्यक्त किए। अनिल सक्सेना ने कहा कि उनकी पुस्तक उनके जीवनानुभवों पर आधारित है। साधना जोशी ने छंदबद्ध गीतों की परंपरा का समर्थन करते हुए अतुकांत कविता के नाम पर लिखी जा रही कमजोर रचनाओं की आलोचना की। इंदु सिन्हा ने अपने कहानी-संग्रह ‘उन दिनों प्रेम’ की रचनात्मक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला।

वरिष्ठ लेखक फारूक अफरीदी ने अनिल सक्सेना ‘ललकार’ के लेख-संग्रह को कला, संस्कृति, पर्यटन और साहित्य पर आधारित महत्वपूर्ण दस्तावेज बताते हुए कहा कि इसमें पिछले डेढ़ दशक की साहित्यिक यात्राओं और अनुभवों का मूल्यवान संकलन है। उन्होंने साहित्यिक आयोजनों में हुई चर्चाओं के दस्तावेजीकरण की भी आवश्यकता बताई।

समीक्षक कविता मुखर ने ‘उन दिनों प्रेम’ संग्रह की बारह कहानियों में प्रेम के विविध सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय आयामों की चर्चा करते हुए कहा कि लेखिका ने जीवन को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया है। कवि-लेखक प्रेमचंद गांधी ने साधना जोशी ‘प्रधान’ के कविता-संग्रह को अध्यात्म, समाज, संस्कृति और समकालीन सरोकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण काव्य-संग्रह बताते हुए उसकी भाषा, लोकधर्मिता और संवेदनात्मक पक्ष की सराहना की।

समारोह में चरणसिंह पथिक, गजेन्द्र एस. श्रोत्रिय, कलमकार मंच के राष्ट्रीय संयोजक निशांत मिश्रा, प्रेस क्लब अध्यक्ष मुकेश मीणा और महासचिव राजकुमार शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर उपस्थित साहित्यकारों ने माना कि बदलते समय में साहित्य की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है तथा लेखक को निरंतर अध्ययन, आत्मसमीक्षा और सामाजिक सरोकारों के प्रति सजग रहते हुए सृजन करना चाहिए। कार्यक्रम में साहित्य, कविता, कहानी, छंद, मुक्तछंद, परंपरा, समकालीन लेखन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसे विषयों पर गंभीर चर्चा एवं साहित्यिक विमर्श हुआ।

समारोह में बसन्त व्यास, श्याम माथुर, राजेश शर्मा, नवल पाण्डे, अनिल शर्मा, मुकेश चौधरी, आशा पटेल, महेश कुमार, जनित, संदीप मील, चंद्रप्रकाश गुप्ता, नितिन यादव, मारध्वज सिंह, प्रेरक मिश्रा, डाॅ. नरेन्द्र प्रधान, विनिता, डाॅ. विदुषी, ओमेन्द्र मीणा, अक्षत मिश्रा और संतोष शर्मा सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी और पत्रकार मौजूद थे। अंत में वरिष्ठ साहित्यकार नवल पाण्डे ने आभार व्यक्त किया।

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