गोविंद देवजी मंदिर में जीवंत हुई ऋषि परंपरा: बिना किसी खर्च के वैदिक रीति से मनाए जा रहे जन्मदिन और विवाह दिवस

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The tradition of sages comes alive at the Govind Devji Temple.
The tradition of sages comes alive at the Govind Devji Temple.

जयपुर। आराध्य देव श्री गोविन्द देवजी का मंदिर इन दिनों एक भव्य संस्कारशाला का स्वरूप धारण किए हुए है। प्राचीन ऋषि-आश्रमों की पावन परंपरा को जीवंत करते हुए, यहाँ प्रत्येक रविवार को जन्मदिन, विवाह दिवस, विद्यारंभ और पुंसवन सहित विभिन्न वैदिक संस्कार पूर्णतः नि:शुल्क कराए जा रहे हैं।

इन आयोजनों का मुख्य उद्देश्य आधुनिक दौर में परिवारों को भारतीय संस्कृति से जोड़ना तथा जीवन मूल्यों को सुदृढ़ करना है। इस अभियान की सबसे विशेष बात यह है कि सभी वैदिक संस्कार और पंच कुंडीय गायत्री महायज्ञ पूरी तरह नि:शुल्क संपन्न कराए जाते हैं।

यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को पूजा या यज्ञ की किसी भी प्रकार की सामग्री अपने साथ लाने की आवश्यकता नहीं होती। यज्ञ की समस्त व्यवस्था मंदिर प्रबंधन द्वारा की जाती है और यज्ञ में शामिल होने वाले प्रत्येक सहभागी को स्वयं अपने हाथों से आहुति देने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

इसी कड़ी में गोविन्द देवजी मंदिर के महंत अंजन कुमार गोस्वामी के पावन सान्निध्य में साप्ताहिक नि:शुल्क पंच कुंडीय गायत्री महायज्ञ एवं संस्कार समारोह अत्यंत श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण के बीच संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में आचार्य पीठ से महेंद्र कुमार, कामिनी शर्मा एवं ज्योति सोनी ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हवन संपन्न कराया और विभिन्न संस्कारों को विधि-विधान से पूरा करवाया।

आयोजित समारोह में भारतीय संस्कृति एवं वैदिक परंपरा के अनुरूप तीन जन्मदिन संस्कार, दो विवाह दिवस संस्कार तथा एक विद्यारंभ संस्कार कराए गए। जन्मदिन मनाने वाले श्रद्धालुओं और उनके परिजनों ने पंच तत्त्व का पूजन किया और यज्ञ में विशेष आहुतियां दीं। उपस्थित जनसमूह ने उन पर पुष्प वर्षा कर आशीर्वाद दिया। इस दौरान जन्मदिन मनाने वालों ने जीवन से एक बुराई छोड़कर एक अच्छी आदत अपनाने का संकल्प लिया।

विवाह की वर्षगांठ मना रहे दंपतियों ने वैदिक मंत्रों के बीच एक-दूसरे को पुनः सम्मान, सहयोग और आदर्श दाम्पत्य जीवन जीने का संकल्प दोहराया। इस संस्कार के माध्यम से नन्हे बालक के उज्ज्वल, संस्कारित एवं ज्ञानमय जीवन की मंगल कामना की गई और शिक्षा की शुरुआत वैदिक रीति से हुई। मंदिर प्रशासन का यह प्रयास जयपुर वासियों के लिए आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है, जिससे नई पीढ़ी अपनी जड़ों और सनातन संस्कृति से जुड़ रही है।

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