जयपुर। जनमानस में आध्यात्मिक चेतना, नैतिक मूल्यों और संस्कारित जीवन के प्रति जागरूकता का प्रसार करने के उद्देश्य से किरण पथ, मानसरोवर स्थित वेदना निवारण केन्द्र में मंगलवार को भव्य कलश यात्रा के साथ श्रीमद् पावन प्रज्ञा पुराण कथा का शुभारंभ हुआ। धार्मिक वातावरण और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच निकली कलश यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
कार्यक्रम की शुरुआत वरुण देवता के पूजन से हुई। इसके बाद स्वर्ण पथ स्थित मातेश्वरी मंदिर से कलश यात्रा रवाना हुई। “चलो-चलो सुहागन नार, कलश सिर धारण करो” गीत की मधुर स्वर लहरियों के बीच पीली साड़ी धारण किए महिलाएं सिर पर मंगल कलश रखकर चल रही थीं, वहीं पुरुष श्रद्धालु हाथों में ओम अंकित पीले ध्वज थामे “हम बदलेंगे, युग बदलेगा, हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा” के जयघोष के साथ यात्रा में शामिल हुए।
मध्यम मार्ग से होते हुए कलश यात्रा वेदना निवारण केन्द्र पहुंची, जहां श्रद्धापूर्वक कलशों की आरती उतारी गई। इसके पश्चात गायत्री परिवार राजस्थान के मुख्य ट्रस्टी ओमप्रकाश अग्रवाल, ट्रस्टी सतीश भाटी, गायत्री शक्तिपीठ कालवाड़ के मुख्य ट्रस्टी धर्म सिंह राजावत, वेदना निवारण केन्द्र के व्यवस्थापक आर.डी. गुप्ता, केदार शर्मा, ललिता शर्मा एवं अन्य गणमान्यजनों ने वेदमाता गायत्री और गुरु सत्ता के चित्रों के समक्ष विधिवत पूजन-अर्चन कर प्रज्ञा पुराण कथा का शुभारंभ किया।
शांतिकुंज हरिद्वार के पुष्कर जोन की टोली के साथ पधारे गोपाल स्वामी ने व्यासपीठ से प्रज्ञा पुराण का श्रवण कराते हुए कहा कि भारतीय इतिहास और पुराणों में मनुष्य के जीवन में आने वाली असंख्य समस्याओं के समाधान निहित हैं। वर्तमान समय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए यदि इनका सही चयन और अनुसरण किया जाए तो समाज की अनेक समस्याओं का समाधान संभव है।
उन्होंने कहा कि सभी 18 पुराणों का सार प्रज्ञा पुराण में समाहित है। इसकी रचना युग ऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने युगीन समस्याओं के समाधान और मानव जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के उद्देश्य से की थी। उन्होंने कहा कि भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट आचरण से संघर्ष करने के लिए आध्यात्म दर्शन को व्यवहारिक जीवन में उतारना आवश्यक है।
गोपाल स्वामी ने कहा कि जिस प्रकार परमात्मा और आत्मा में केवल स्वरूप का अंतर है, उसी प्रकार परिवार और समाज भी एक-दूसरे के पूरक हैं। परिवार को संस्कारित और समुन्नत बनाना समाज उत्थान की प्रथम सीढ़ी है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने ज्ञान, कौशल और क्षमता का उपयोग परिवार और समाज की सेवा में करे तो आदर्श समाज निर्माण का लक्ष्य सहजता से प्राप्त किया जा सकता है।



















