जयपुर। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी 25 जुलाई को श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाई जाएगी। इसे हरिशयनी, पद्मा एवं आषाढ़ी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं।
इसी के साथ चातुर्मास का शुभारंभ हो जाता है, जो कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी तक चलता है। एकादशी तिथि 24 जुलाई को प्रात: 9:12 बजे प्रारंभ होकर 25 जुलाई को प्रात: 11:34 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई को रखा जाएगा। ब्रह्म मुहूर्त प्रात: 4:45 बजे से 5:29 बजे तक तथा अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:19 बजे से 1:11 बजे तक रहेगा। व्रत का पारण 26 जुलाई को प्रात: 6:13 बजे से 8:50 बजे के मध्य करना शुभ माना गया है।
ज्योतिषाचार्य पं. पुरूषोत्तम गौड़ ने बताया कि देवशयनी एकादशी का सनातन धर्म में अत्यंत विशेष महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा-अर्चना, व्रत, भजन-कीर्तन, जप-तप, धार्मिक अनुष्ठान, दान-पुण्य एवं सेवा कार्य करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है। चातुर्मास के चार महीने साधना, संयम, आत्मचिंतन, आध्यात्मिक उन्नति और भगवान की आराधना के लिए सर्वोत्तम माने गए हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस अवधि में किए गए जप, तप, व्रत, दान और सेवा का फल सामान्य दिनों की अपेक्षा कई गुना अधिक प्राप्त होता है।
चार माह तक नहीं होंगे ये आयोजन:
देवशयनी एकादशी के साथ ही विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन, यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार, नए भवन का शुभारंभ तथा अन्य सभी मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाएगा। यह प्रतिबंध देवउठनी एकादशी तक प्रभावी रहेगा। इस अवधि में कथा, सत्संग, भागवत श्रवण, भजन-कीर्तन, भगवान की आराधना, व्रत, दान, सेवा एवं धर्म प्रचार का विशेष महत्व रहेगा। चातुर्मास के दौरान साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर प्रवचन, स्वाध्याय और धर्मोपदेश करते हैं तथा श्रद्धालु सात्विक जीवन अपनाकर भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं।
राजा बलि से जुड़ी है देवशयनी एकादशी की पौराणिक कथा:
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु के चार माह के शयन का संबंध राजा बलि से जुड़ा हुआ है। वामन अवतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग भूमि का दान मांगा था। राजा बलि ने अपना वचन निभाते हुए दान दे दिया। उनकी अतुलनीय दानशीलता और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य प्रदान किया।
राजा बलि की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वर्ष में चार महीने उनके साथ पाताल लोक में निवास करने का वचन दिया। तभी से देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं।
भगवान शिव संभालेंगे सृष्टि का कार्यभार:
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में सृष्टि के संचालन का दायित्व भगवान शिव निभाते हैं। यही कारण है कि चातुर्मास को तप, त्याग, संयम, साधना, भक्ति और धर्म पालन का अत्यंत पवित्र काल माना गया है। श्रद्धालु इन चार महीनों में सात्विक आहार-विहार अपनाकर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं और जीवन में सुख, समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति की कामना करते हैं।



















